इस क्रिया के अभ्यास से पाचन शक्ति बढ़ती है. कब्ज़ और भूख न लगने जैसे पेट के रोग दूर होते हैं.गहरी साँस भरने और छोड़ने का अभ्यास भी होता है.
इस क्रिया से यह भी पता चलता है कि साँस भरते हुए पहले पेट फूलना चाहिए और छाती बाद में फूलना चाहिए.
किसी रोग से पीड़ित होने पर आमतौर पर हम ग़लत तरीके से साँस लेते हैं. अर्थात साँस लेते समय हमारा पेट पिचक जाता है लेकिन योग की दृष्टि से पहले पेट फूलना चाहिए और सासँ भरते समय छाती फूलनी चाहिए.
इसी प्रकार साँस छोड़ते हुए पहले फेफड़ों से साँस बाहर आएगी और फिर पेट अंदर जाएगा.
उदर शक्ति विकासक क्रिया में सिर्फ़ पेट को फुलाना है और पिचकाना है.
विधि सीधे खड़े हो जाएँ. दोनों पैर मिलाकर रखें. दोनों हाथों को जंघा के साथ बगल में सटाकर रखें.
कमर, गर्दन, कंधे और रीढ को सीधा रखें. शरीर में ढीलापन नहीं होना चाहिए.
अपनी नाभि पर ध्यान लगाएं. पूरी सजगता से धीरे धीरे गहरी सांस भरें. पेट को फुलाएं और उसे घड़े की आकृति दें. दो सेकण्ड रूकें.
इस क्रिया के प्रति सजग हो जाएँ. अब साँस छोड़ते हुए पेट को पिचकाएँ ताकि नाभि अंदर की ओर धस जाए. इस अवस्था में भी दो-तीन सेकण्ड रूकें.
अब सामान्य स्थिति में आएँ और साँस को भी सामान्य कर लें. अपनी शक्ति के अनुसार इसे पाँच बार दोहराएँ.
सावधानी : उच्च रक्तचाप, हर्निया, अल्सर से पीड़ित लोगों को इस क्रिया का अभ्यास नहीं करना चाहिए. गर्भवती महिलाएँ इसका अभ्यास नहीं करें. लाभ जो व्यक्ति ग़लत तरीके से साँस लेते हैं, वे इस क्रिया के अभ्यास से इसमें सुधार कर सकते हैं.
योग की दृष्टि से पहले पेट भूलना चाहिए और छाती बाद में फूलना चाहिए. साँस भरते हुए कुछ लोग पेट पिचका लेते हैं जो ग़लत है.
आसन के दौरान वातावरण तनाव रहित होना चाहिए
इसे करने से योग की दृष्टि से गहरी साँस भरने और पूरी साँस को निकालने का अभ्यास होता जाता है.
इस क्रिया के अभ्यास से पाचन शक्ति बढेगी और कब्ज़, भूख न लगना जैसे पेट के रोग दूर होते हैं.
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में विश्वास रखने वाले लोग भी योग को मानते हैं क्योंकि सभी वर्ग के लोग योगासन और प्राणायाम के अभ्यास से कई रोगों से छुटकारा पा रहे हैं.
ह्रदय रोगी के लिए: लेकिन अगर किसी रोग विशेष में योग के अभ्यास से लाभ प्राप्त करना चाहते हैं तो अपने डॉक्टर और योग शिक्षक की सलाह ज़रूर लेनी चाहिए. उदाहरण के तौर पर ह्रदय रोगी को सभी प्रकार के आसन और प्राणायाम नहीं करने चाहिए. आसन : ह्रदय रोगी सरल और हल्के-फुल्के आसन करने चाहिए जैसे हस्त उत्तानासन, ताड़ासन, गोमुखासन, मकरासन, शवासन आदि. प्राणायाम :अनुलोम विलोम प्राणायाम का अभ्यास ज़्यादा से ज़्यादा करना चाहिए. कपाल भाति, भस्त्रिका का अभ्यास नहीं करना चाहिए. त्याग : धूम्रपान, सिगरेट, शराब का सेवन नहीं करें. भोजन :शुद्ध शाकाहारी भोजन करें और अपनी पाचन क्षमता का ख्याल रखें. भूख से ज़्यादा नहीं खाना चाहिए. तला, भुना और मिर्च मसालेदार भोजन नहीं करना चाहिए. ह्रदय रोगी को अपने वजन पर काबू रखना चाहिए. अतिरिक्त चर्बी हानिकारक है. दिनचर्या :प्रात:काल की सैर और सरल आसन प्राणायाम आधा घंटा करना चाहिए. वातावरण :प्रयास करें कि वातावरण तनाव रहित हो.