
नयी दिल्ली (ब्यूरो)। डीजल कीमतों में भयंकर बढ़ोत्तरी, एलपीजी सब्सिडी की सीमा तय करने और रिटेल में एफडीआई को लेकर तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद भी सरकार मुश्किल में नहीं दिख रही है। यूपीए सरकार और ममता बनर्जी के अपने फैसलों पर टिके रहने के कारण राजनीति में खासा उबाल है। वहीं यूपीए को ज्यादा संख्या बल जुटाने में ज्यादा परेशानियां नहीं उठानी पड़ रही है क्योंकि ऐसी संभावना व्यक्त की जा रही है कि बसपा सुप्रीमो मायावती सरकार का साथ दे सकती हैं। सीधे शब्दों में कहें तो मायावती सरकार में ममता की जगह ले सकती हैं।
बुधवार को ऐसी खबर आई थी कि बसपा ने यूपीए को समर्थन देने का आश्वासन दिया है। सूत्रों की मानें तो अब इस बात की पूरी संभावना है कि ममता के अपने स्टैंड पर अडिग होने की स्थिति में मायावती की पार्टी यूपीए सरकार का साथ देगी। यूपीए की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी तृणमूल चाहती है कि सरकार खुदरा क्षेत्र में एफडीआई का निर्णय वापस ले, डीजल के मूल्यों में तीन से चार रुपये की कमी करे और एलपीजी सिलेंडरों की संख्या प्रति वर्ष 24 की जाए। सरकार का बाहर से समर्थन कर रही समाजवादी पार्टी की रणनीति पर संशय बरकरार है।
यदि कांग्रेस पार्टी अपने रास्ते तृणमूल कांग्रेस से अलग करती है तो भी सत्तारूढ़ पार्टी के लिए प्रमुख नीतिगत फैसले लेने में दिक्कतें नहीं आएंगी। सूत्रों का कहना है कि ऐसे में मायावती की पार्टी सरकार के लिये संकटमोचन बन सकती है। हालांकि सपा ने अभी अपने कोई भी पत्ते नहीं खोले हैं और और पार्टी की संसदीय दल की बैठक के बाद आगे की रणनीति बनाने की बात कही है।


















