
नई दिल्ली। अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने पदोन्नति में आरक्षण को खारिज किया था। उसके बाद राजनीतिक पार्टियां आपसी सहमति बनाकर संविधान संसोधन करने की तैयारी में जुट गई। सरकार की ओर से सहमति के संकेत मिल रहे हैं। जब संसद में संशोधन बिल आएगा तो देखना है कि राजनीतिक पार्टियों का रूख क्या होता हैं। सरकारी नौकरियों पर अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लोगों के पदोन्नति में आरक्षण मुद्दे पर लगभग सभी दलों में सहमति बन चुकी है।
अप्रैल के महीने में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार के इस फैसले को खारिज कर दिया था जिसमें कहा गया था कि सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लोगों को पदोन्नति में आरक्षण देने की बात कही गयी थी। राज्य में यह घोषणा पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के शासन काल में की गयी थी। इस मुद्दे पर सरकार ने संविधान में संसोधन के लिए मंगलवार को सर्वदलीय बैठक बुलाई थी।
भाजपा का इसपर कहना है कि वह कमजोर लोगों को ताकत दिलाने के पक्ष में है, लेकिन संवैधानिक और कानूनी पक्ष को ध्यान में रखना चाहिए। समाजवादी पार्टी (सपा) ने इसपर आपत्ति जताते हुए कहा है कि अगर एससी, एसटी को आरक्षण मिला तो ओबीसी को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। सपा का बहुत बड़ा वोटबैंक ओबीसी से आता है।
आरक्षण मामले पर वाम दलों ने भी सरकार का समर्थन किया है और कहां है कि संविधान में इस तरह का संसोधन करना चाहिए जो लंबे समय तक चल सके। पीएम ने इस मुद्दे पर कहा है कि सभी पार्टियों ने इसपर अच्छा सुझाव दिया है। हालांकि अभी ये साफ नहीं हो पाया है कि यह संसोधन मानसून सत्र में किया जाएगा या अगले सत्र में।
किसी भी राजनीतिक पार्टी का इसपर अभी तक खुलकर विरोध नहीं दिखा है, लेकिन समाज का एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो आरक्षण व्यवस्था का ही विरोध करता है। अब देखना यह है कि संविधान संसोधन के समय कैसा माहौल खड़ा होता है। आरक्षण वैसे ही काफी गर्मजोशी भरा मुद्दा रहा है।





















