
बैंगलौर। ओलंपिक समाप्त हो चुका है, जिसके साथ्ा ही भारत के प्रदर्शन और गलतियों पर एक बहस भी शुरू हो गयी है। लंदन ओलंपिक 2012, भारतीय ओलंपिक इतिहास के सबसे सफल ओलंपिक कहे जा सकते हैं। इस ओलंपिक में भारत ने दो रजत और चार कांस्य के साथ कुल 6 पदक जीते। विश्व स्तर पर भारत के कद को देखते हुए और अन्य देशों के पदकों से तुलना करने पर इनकी संख्या भले ही बेहद कम लग रही हो, पर यहां से खेलों के ढ़ाचे में सुधार और विस्तार कर भविष्य में पदकों की संख्या में निश्चित रूप से इज़ाफा किया जा सकता है।
एथेंस ओलंपिक में राज्यवर्धन सिंह राठौर के डबल ट्रैप इवेंट में रजत पदक जीतने से जहां शूटिंग को पहचान मिली वहीं बीजिंग ओलंपिक में 10 मीटर एयर राइफल स्पर्धा में अभिनव बिन्द्रा के स्वर्ण पदक जीतने से शूटिंग को लोकप्रियता हासिल हुई। इसके साथ ही विजेंद्र सिहं के बाक्सिंग और सुशील कुमार के कुश्ती में पदक जीतने से बॉक्सिंग और कुश्ती को पहचान मिली। लंदन ओलंपिक भारतीय खेलों के लिहाज से सबसे अच्छा कहा जा सकता है। चार साल पहले बीजिंग में भारत ने तीन पदक जीते तो लंदन में छह पदक। पदकों की संख्या में हुई वृद्धि यह भी दिखाती है कि सरकार ने पिछले चार सालों में खेलों को लेकर गंभीरता तो ज़रूर दिखायी। वैसे तो यह पर्याप्त नहीं कहा जा सकता है, पर लंदन ओलंपिक खेलों के लिहाज से एक उम्मीद तो ज़रूर जगाता है कि देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है, ज़रूरत है तो बस उन्हें तराशने की।
बीजिंग में तीन, लंदन ओलंपिक में 6 पदक, अगले चार सालों में हमें इससे अधिक पदकों का लक्ष्य लेकर चलना होगा। इसके लिए हमें प्रतिभाओं की तलाश करनी होगी, उन क्षेत्रों से जहां बच्चे बचपन में ही तैरना सीख जाते हैं, जहां लोग आज भी तीरंदाज़ी करते है। ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों की प्रतिभा पहचान कर उन्हें प्रशिक्षित करना होगा। शूटिंग में विजय कुमार और गगन नारंग, बैडमिंटन में सायना नेहवाल, बॉक्सिंग में मैरी कॉम, कुश्ती में सुशील कुमार और योगेश्वर दत्त की सफलता यही कहती है कि अगर सरकार से सहयोग और लोगों का समर्थन मिले तो इन 6 पदकों को एक बड़ी संख्या में बदलने में धीरे- धीरे ही सही कामयाबी ज़रूर पाई जा सकती है।


















