
यूपीए 1 और यूपीए 2 में जब-जब परेशानियां आयीं, तब-तब प्रणब मुखर्जी संकट मोचक के रूप में दिखाई दिये। उन्होंने बड़े-बड़े विवाद चुटकियों में सुलझाये। अब यह संकट मोचक दिल्ली की रायसीना हिल की ओर अग्रसर हैं। उनकी नई पारी की शुरुआत से पहले हम आपको रू-ब-रू करा रहे हैं प्रणब दा के राजनीतिक सफर से।
पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले के किरनाहर शहर के पास 11 दिसंबर 1935 को मिराती गांव में कामदा किंकर मुखर्जी और राजलक्ष्मी के घर प्रणब का जन्म हुआ। उनके पिता कांग्रेस पार्टी की ओर से पश्चिम बंगाल विधान परिषद (1952-64) के सदस्य और वीरभूम जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रह चुके थे। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका निभाई थी। वे 10 साल तक जेल में रहे थे।
प्रणब दा ने वीरभूम के सूरी विद्यासागर कॉलेज में शिक्षा ग्रहण की और फिर कलकत्ता विश्वविद्यालय में पढ़ने चले गये। प्रणव दा ने अपने करियर की शुरुआत कॉलेज शिक्षक के रूप में की और फिर पत्रकार बन गये। बतौर पत्रकार प्रणब दा ने बांग्ला प्रकाशन संस्थान देशेर डाक (मातृभूमि की पुकार) के लिए काम किया। वे बंगीय साहित्य परिषद के ट्रस्टी और बाद में निखिल भारत बंग साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष भी बने।
पत्रकारिता के साथ-साथ उन्होंने राजनीति में कदम रखा और कांग्रेस पार्टी ज्वाइन की। 1969 में कांग्रेस पार्टी के राज्यसभा सदस्य के रूप में पहली बार संसद पहुंचे। उसके बाद 1975, 1981, 1993 और 1999 में फिर से चुने गए। 1973 में वे औद्योगिक विकास विभाग के केंद्रीय उप मंत्री के रूप में मंत्रिमंडल में शामिल हुए।
वे सन 1982 से 1984 तक कई कैबिनेट पदों के लिए चुने जाते रहे और और सन 1984 में भारत के वित्त मंत्री बने। उनका कार्यकाल भारत के अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के ऋण की 1.1 अरब अमरीकी डॉलर की आखिरी किस्त नहीं लेने के लिए उल्लेखनीय रहा. वित्त मंत्री के रूप में प्रणव के कार्यकाल के दौरान डॉ. मनमोहन सिंह भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर थे।
वे इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए लोकसभा चुनाव के बाद राजीव गांधी की समर्थक मंडली के षड्यंत्र के शिकार हुए जिसने इन्हें मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया। एक छोटी अवधि के लिए कांग्रेस पार्टी से उन्हें निकाल दिया गया था और उस दौरान उन्होंने अपने राजनीतिक दल राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस का गठन किया, लेकिन बाद में सन 1989 में राजीव गांधी के साथ समझौता होने के बाद उसका कांग्रेस पार्टी में विलय हो गया।
यहां से प्रणब दा ने एक और नई शुरुआत की और फिर पीवी नरसिंह राव प्रधानमंत्री कार्यकाल में वे केंद्रीय कैबिनेट मंत्री बने। 1995 से 1996 तक वे विदेश मंत्री रहे।
सन 2004 में, जब कांग्रेस ने गठबंधन सरकार के अगुआ के रूप में सरकार बनायी, तो कांग्रेस के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सिर्फ एक राज्यसभा सांसद थे. इसलिए जंगीपुर (लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र) से पहली बार लोकसभा चुनाव जीतने वाले प्रणव मुखर्जी को लोकसभा में सदन का नेता बनाया गया। वे अपने करियर में रक्षा, वित्त, विदेश विषयक मंत्रालय, राजस्व, नौवहन, परिवहन, संचार, आर्थिक मामले, वाणिज्य और उद्योग, समेत विभिन्न महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाल चुके हैं।
प्रणब दा इस समय कांग्रेस संसदीय दल और कांग्रेस विधायक दल के नेता हैं, जिसमें देश के सभी कांग्रेस सांसद और विधायक शामिल होते हैं। साथ-साथ वह लोकसभा में सदन के नेता, बंगाल प्रदेश कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष, कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की मंत्रिपरिषद में केन्द्रीय वित्त मंत्री हैं। इस पद से प्रणब दा 25 तारीख तक इस्तीफा दे देंगे। और अगर सभी दलों के सांसद-विधायकों की सहमति हुई तो वो देश के अगले राष्ट्रपति होंगे।


















