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यहां केवल एक गुजरात है वो भी- चमकता हुआ गुजरात

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Published: Sunday, February 26, 2012, 20:55 [IST]

 Narendra Modi There Exists Only One Gujarat Part 1 Aid0092

गुजरात दंगो की 10वीं बरसी नरेन्द्र मोदी के लिए एक सुनहरा अवसर लेकर आयी है। मोदी के पास यह सुनहरा मौका है अपने आप को प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष साबित करने का। पिछले एक दशक से मोदी को लोकतंत्र के खिलाफ की गयी गतिविधियों में शामिल बताया जा रहा था, हालांकि अभी तक यह प्रमाणित नहीं हो पाया है। लेकिन कुछ प्रगतिशील पत्रकारों ने गुजरात और गुजरात में रह रहे मुसलमानों के लिए किये गये मोदी के कार्यों को छवि बिगाड़ने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी है। उन्हें मोदी के किये गये विकास कार्य नजर नहीं आते हैं बल्कि वो जानबूझकर गोधरा की काली स्याही को लोगों के दिल-दिमाग पर अंकित करने में लगे रहते हैं।

एडवर्ड ने कहा गोधरा दंगो के स्वरूप को गंदी तस्वीर में बदलने के लिए देश के मीडिया तंत्र ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी है। जिस तरह से मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में नस्लवादी और रंगभेद के मसले हल किये गये वैसे भारतीय मीडिया ने नहीं किया है। यह स्वरूप दर्शाता है किस तरह नजरीया लोगों और मीडिया के अंदर है। जो कुछ भी लोगों को दिखाया और सुनाया जाता है वो एक सतही सच और एकतरफा तस्वीर होती है। मीडिया सच से कोसों दूर है। जो मुसलमानों की दशा को बेहद ही नीरस और सतही करके दिखाती है जो कि सही नहीं है।

राजदीप सरदेसाई ने तो दो गुजरात की तस्वीर दिखायी जबकि क्रिस्टोफ़ जैफ्लोट ने जो दिखाया उसमें जमीनी सच्चाई की कमी थी। टीवी पर गोधरा दंगो को लेकर स्पेशल प्रोग्राम दिखाये जा रहे हैं जिनमें आप गौर फरमाये तो पायेंगे कि एक जैसी समानता है हर शो में। हर शो में यही दिखाया जाता है कि दंगो के बाद गुजरात और गुजरातवासियों पर क्या गुजरी। किसी भी शो में यह दिखाने की कोशिश नहीं होती कि पीड़ित और पीड़ित परिवार वालों के लिए प्रदेश में पिछले दस सालों में क्या हुआ?

मुसलमानों के गुजरात का चित्रण

हर मीडिया कवरेज में दिखाया जाता है कि साल 2002 के बाद मुसलमानों की स्थिति गुजरात में दयनीय हो गयी है। उन्हें अपनी जीविका चलाने के लिए मुश्किलों का सामना करता पड़ता है। बेशर्मी की सारी सीमायें पार करते हुए टीवी शो में दिखाया जाता है कि एक मुस्लिम परिवार कितनी दिक्कतों के साथ एक झोपड़ी में रहता है। उस झोपड़ी में उसके रोते-बिलखते बच्चे तो रहते ही हैं साथ ही उसमें उसके जानवर, जैसे कुत्ते और बकरी भी रहते हैं। उसके रोते-बिलखते भूखे-नंगे बच्चों के चारों ओर मच्छरों और मक्खियों का मेला लगा रहता है। जिसे देखकर आपको एक बार लगेगा कि आप जैसे कोई साल 2002 की हॉरर यानी डरावनी फिल्म देख रहे हैं।

अब आप ही बताइये कि क्या यह तस्वीर पूरी तरह से सही है? साल 2002 में या उसके बाद गुजरात के मुसलमानों की हालत ऐसी या इससे बदतर थी? तथ्यों की मानें तो सच्चर कमेटी में स्पष्ट कहा गया है कि गुजरात के मुसलमान अन्य राज्यों में की तुलना में एक बेहतर जीवन व्यतीत करते हैं। अगर ऐसा होता तो गुजरात के सीएम नरेन्द्र मोदी के उपवास के दौरान सुषमा स्वराज एक मुसलमान व्यपारी की बात नहीं बतातीं जिसे मोदी सरकार ने लाल कालीन भेंट की थी। यही नहीं मुस्लिम डीजीपी ने खुद कहा है कि गुजरात ने पिछले 10 सालों में खासी तरक्की है। यह विकास पूरे गुजरात का है, जिसमें मुसलमान भी शामिल है। केवल एक जाति या धर्म की उन्नति नहीं हुई है, इसलिए यह विकास पूरे गुजरात का है जिसमें मुसलमान भी शामिल हैं।

लेकिन कुछ लोग इस सच को स्वीकार करने के बजाय झूठलाने और लोगों को भ्रमित करने में जुटे हुए हैं। ऐसे लोगों के चलते मौलाना वास्तनवी जैसे सच्चे लोगों को अपनी कुर्सी और अपने पद से हाथ धोना पड़ता है। वास्तनवी का कसूर सिर्फ इतना था कि उन्होंने नरेन्द्र मोदी के बारे में सच बोलते हुए उनकी तारीफ की थी। 24 घंटो की पल-पल की खबर दिखाने का दावा करने वाले चैनलों से सच बहुत दूर रहता है, वो एक ही बात को दस-दस बार कहते हैं, जिससे झूठ भी सच लगने लगता है। कम से कम गुजरात और मोदी के बारे में यही परोसा जा रहा है।

English summary
The 10th anniversary of the Gujarat riots has come as a wonderful opportunity for Narendra Modi bashers to flaunt their ‘progressive’, ‘secular’ credentials. For the past decade, Narendra Modi has come to symbolize everything that has gone wrong with our democracy even though statistics and reality claim otherwise.
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