
गांधीनगर। अंतत: नरेंद्र मोदी एसएईटी के सामने गवाही देने के लिए उपस्थित नहीं हुए। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को गोधरा दंगों में मारे गए कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफरी की पत्नी द्वारा दर्ज कराए गए मुकदमे में गवादी देने के लिए एसआईटी के सामने आना था। लेकिन मोदी के गवाही देने आने से पहले ही कुछ सूत्रों के हवाले से मीडिया में खबर आ गयी थी कि पेशी में मोदी गवाही देने नहीं पहुंचने वाले हैं। मीडिया में ये भी खबरें थीं कि एसआईटी प्रमुख आर.के.राघवन खुद भी इस अहम पेशी में शामिल नहीं होंगे।
पढ़ें - मोदी की पेशी पर सस्पेंस बरकरार
उल्लेखनीय है कि वर्ष 2002 के गुजरात दंगे के दौरान मारे गए कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफरी की पत्नी जाकिया जाफरी ने मोदी पर आरोप लगाए हैं। एसआईटी ने मोदी को 11 मार्च को नोटिस जारी किया गया था। नोटिस में कहा गया था कि वह 21 मार्च से शुरू हो रहे सप्ताह के दौरान अपनी गवाही के लिए एसआईटी के समक्ष उपस्थित हों। सुप्रीम कोर्ट ने खुद इस मुद्दे पर एसआईटी को ताकीद की थी कि वह मोदी का बयान ले। सुप्रीम कोर्ट के सामने ये मसला जाफरी की पत्नी ने उठाया था।
मोदी के इस रवैये से साफ जाहिर होता है कि कानून और व्यवस्था मोदी के लिए मायने नहीं रखते। एसआईटी प्रमुख का खुद भी इस पेशी के लिए उपस्थित ना होना इस बात का संकेत है कि मोदी की पहुंच ऊपर तक है। मोदी चाहें तो वह सुप्रीम कोर्ट के फैसले को माने या अगर वह नहीं चाहते हैं तो उन्हे कोई भी जबर्दस्ती कानून के सामने आने तक के लिए भी मजबूर नहीं कर सकता। ऐसे में गोधरा दंगों के पीड़ितों को न्याय मिलना तो दूर की बात है उल्टे उन की जान को खतरा पैदा हो सकता है।
वैसे भी गुजरात और नरेंद्र मोदी एक दूसरे के पर्यायवाची हो बन चुके हैं। मतलब वहां तो उनकी तूती बोलती है। तो ऐसी बिल्ली के गले में घंटी बांधने की हिकामत कौन करे जो प्रशासन, कानून और सुप्रीम कोर्ट को हर बार धता बताता है। अब अगर भाजपा नरेंद्र मोदी को रोल मॉडल के तौर पर पेश कर रही है तो इसमें गलती भाजपा की नहीं बल्कि मौजूदा प्रशासन की बेचारगी ही इस के लिए दोषी है। पूरा देश जानता है कि गुजरात का सच क्या है लेकिन नरेंद्र मोदी हर बार सब को ठोंगा दिखा कर साफ बच निकलता है।
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उल्लेखनीय है कि वर्ष 2002 के गुजरात दंगे के दौरान मारे गए कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफरी की पत्नी जाकिया जाफरी ने मोदी पर आरोप लगाए हैं। एसआईटी ने मोदी को 11 मार्च को नोटिस जारी किया गया था। नोटिस में कहा गया था कि वह 21 मार्च से शुरू हो रहे सप्ताह के दौरान अपनी गवाही के लिए एसआईटी के समक्ष उपस्थित हों। सुप्रीम कोर्ट ने खुद इस मुद्दे पर एसआईटी को ताकीद की थी कि वह मोदी का बयान ले। सुप्रीम कोर्ट के सामने ये मसला जाफरी की पत्नी ने उठाया था।
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प्रशासन को फिर ठेंगा दिखाया मोदी के इस रवैये से साफ जाहिर होता है कि कानून और व्यवस्था मोदी के लिए मायने नहीं रखते। एसआईटी प्रमुख का खुद भी इस पेशी के लिए उपस्थित ना होना इस बात का संकेत है कि मोदी की पहुंच ऊपर तक है। मोदी चाहें तो वह सुप्रीम कोर्ट के फैसले को माने या अगर वह नहीं चाहते हैं तो उन्हे कोई भी जबर्दस्ती कानून के सामने आने तक के लिए भी मजबूर नहीं कर सकता। ऐसे में गोधरा दंगों के पीड़ितों को न्याय मिलना तो दूर की बात है उल्टे उन की जान को खतरा पैदा हो सकता है।
वैसे भी गुजरात और नरेंद्र मोदी एक दूसरे के पर्यायवाची हो बन चुके हैं। मतलब वहां तो उनकी तूती बोलती है। तो ऐसी बिल्ली के गले में घंटी बांधने की हिकामत कौन करे जो प्रशासन, कानून और सुप्रीम कोर्ट को हर बार धता बताता है। अब अगर भाजपा नरेंद्र मोदी को रोल मॉडल के तौर पर पेश कर रही है तो इसमें गलती भाजपा की नहीं बल्कि मौजूदा प्रशासन की बेचारगी ही इस के लिए दोषी है। पूरा देश जानता है कि गुजरात का सच क्या है लेकिन नरेंद्र मोदी हर बार सब को ठोंगा दिखा कर साफ बच निकलता है।













