टीवी कैमरे और नेताओं को बनाएं निशाना!

Published: Friday, November 28, 2008, 14:48 [IST]

             टीवी कैमरे और नेताओं को बनाएं निशाना!

वे अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभा रहे हैं। इनमें शामिल हैं सेना, नेशनल सिक्योरिटी गार्ड (एनएसजी) और पुलिस के जवान और तमाम वे लोग जो गुमनामी में रहकर भी दूसरों की मदद के लिए आगे रहते हैं। दूसरी तरफ हैं हमारे हड़बड़ाए हुए नेता जो चाहते हैं कि इस 'मौके' का जल्दी से जल्दी फायदा उठा सकें और टीवी चैनल्स के फ्री एयर-टाइम में अपना चेहरा दिखा सकें। हमारे फैशनेबल गृहमंत्री बुधवार की देर रात एनएसजी की रणनीति का खुलासा कर डाला। हमारे बहादुर जवानों के साथ इससे बड़ा मजाक और क्या हो सकता है?

दूसरी तरफ आतंकी टीवी चैनल की मदद से आसानी से यह जानते रहे कि बाहर क्या चल रहा है। उन टीवी चैनलों से अनुरोध है कि इस आतंकी घटना के अलावा कृपया कुछ और न फोकस करें। हमें पता है लाखों निगाहें आपके स्क्रीन की तरफ टकटकी लगाए बैठी हैं मगर पल भर को एनएसजी और सेना के जवानों की जिंदगी के बारे में भी सोचिए। उन्हें अपना काम करने दीजिए। इस आपरेशन के बाद हम सब वादा करते हैं कि इडियट बाक्स के साथ दिन भर चिपके रहेंगे और आपके विज्ञापनदाताओं का जी खुश कर देंगे। मुंबई में क्या हो रहा है हम सभी जानना चाहते हैं मगर जवानों की जिंदगी की कीमत पर हमें यह जानकारी नहीं चाहिए।

हमारे राजनेता अपनी संवेदनहीनता दिखाने में हर बार और ज्यादा आगे निकल जाते हैं। सेना बल अपनी सुरक्षा के लिए जिन साधनों का इस्तेमाल कर रही है वह हमारे लिए खतरे की घंटी है। हर नेता अपना घर भरने में व्यस्त है। स्विस बैंक में डिपाजिट करने वालों में भारतीयों का स्थान चौथा है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस तरह के धन बटोरने में हमारे देश के कौन से लोग शामिल हैं। किसी भी सरकार में सुरक्षा बलों के वेतन और सुविधाएं बढ़ाने पर ध्यान नहीं दिया। वे आज भी उस वेतन पर गुजारा कर रहे हैं जिससे आज की दुनिया में गुजारा होना भी मुश्किल है।

इस घटना के बाद केद्र सरकार की तरफ कई घंटो तक छाई चुप्पी को सभी मीडिया रिपोर्ट्स में निशाना बनाया गया। जहां प्रधानमंत्री इंतजार कर रहे थे वहीं लालकृष्ण आडवाणी ने बुरी तरह से निराश किया। उन्होंने हालात को देखते हुए इंतजार करना चाहिए था। उनका फ्रस्टेशन अच्छी तरह से समझा जा सकता है, बस यह अंदाजा लगाना मुश्किल है कि वे यह सब वोट बैंक की खातिर कर रहे हैं या वास्तव में देशवासियों के हितों के प्रति चिंतित हैं?

दहशत में डूबी मुंबई का दौरा करने की नरेंद्र मोदी को क्या जरूरत थी? वे अपना बयान गुजरात से भी दे सकते थे। महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें इस माहौल में आने की इताजत क्यों दी? देखा जाए तो यह सुरक्षाकर्मियों के लिए सिर्फ एक सिरदर्द था। उन्होंने हमारे इन 'देशभक्त' नेताओं की हिफाजत भी तो करनी पड़ी।

हम सारे लोग टीवी के जरिए इस पूरे घटनाक्रम के पल-पल की खबरों पर नजर रखे हुए हैं। मेरी नजर में 'टाइम्स नाऊ' के अनरब गोस्वामी ने आम आदमी के सरोकारों को सबसे बेहतर तरीके से प्रस्तुत किया है। कांग्रेस और भाजपा ने हमारी सुरक्षा को चोट पहुंचाई है। कांग्रेस अगर कहती है कि हमारे पास आतंकवाद से निपटने के लिए पर्याप्त कानूनी प्रावधान है तो भगवान के लिए इनका इस्तेमाल तो करें! भाजपा हर ऐसी घटना के बाद पोटा जैसे कानून लागू करने का राग अलापने लगती है। हर वक्त एक-सा राग अलापने वाले हमारे राजनेताओं को सुनना सचमुच कितना उबाऊ है! अमेरिका में राजनेता हर संकट में जिस तरह से अपनी एकता का परिचय देते हैं क्या हमारे नेता वैसा कभी कर सकेंगे?

अभी हर तरफ आर्थिक मंदी की चर्चा थी और यह भी कि कैसे भारत में अचानक विदेशी निवेश घटने लगा। मुझे उम्मीद है कि बाजार आज 500 प्लाइंट ऊपर जाएगा और यही उन कायरों के लिए सबसे बेहतर जवाब होगा। (मैं यह बात सिर्फ आतंकवादियों के लिए कह रहा हूं अपने नेताओं के लिए नहीं)

क्या हमारे नेता बंधकों के बदले अपनी जिंदगी का सौदा करने को तैयार होंगे? कोई है? कोई नहीं!!

लेखक ग्रेनियम इंफार्मेशन टेक्नोलॉजीज़ प्रा.लि. के सीईओ हैं।

 

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