निर्देशक: अरूप दत्ता
&13;प्रोफेसर जोयमोहन (अनुपम खेर) कलकत्ता में रहतें है। वे दिल के मरीज है। एक बार उनके जन्मदिन पर उन्हें दिल का दौरा पड़ता है तो उस दिन उन्हें लगता है कि वह अपना बाकी की जिंदगी अपने परिवार के साथ मुम्बई में बिताएं।
वे अपने बेटे (रजत कपूर), बहू (दिव्या दत्ता) और पोती गार्गी (अविका गौर) के पास मुम्बई पहुंचते है। उनके आने से बेटा और पोती तो खुश होते है लेकिन बहू खुश नही होती है वह लगातार अपनी नाराजगी जाहिर करती रहती है।
जोयमोहन अपनी बोरियत दूर करने के लिए पास के पार्क में सुबह सैर के लिए जाने लगते है। एक सुबह उन्हें अपनी पुरानी छात्रा नीलिमा (शर्मिला टैगोर) और उसकी बेटी अंजली (नरगिस) मिलती है। अंजली अमरीका से डॉक्टरेट की उपाधि लेना चाहती है। जोयमोहन और नीलिमा जिंदगी की कुछ सच्चाईयां एक दूसरे से बांटते है जो दूसरे लोगो के लिए रहस्य है यही फिल्म की कहानी है।
मार्निंग वाक में कुछ नया नही है। निर्देशक ने एक साथ कई चीजों को परोसने की कोशिश की है। अनुपम खेर और अविका गौर के बीच तथा शर्मिला टैगोर के बीच दृश्य अच्छी तरह फिल्माए गए है। दिव्या दत्ता ने फिल्म बागबां में भी ऐसा ही रोल किया था।
&13;निर्देशक अरूप ने भावनात्मक दृश्यों में काफी मेहनत की है तकनीकी रूप से फिल्म काफी अच्छी बनी है। पहली बार निर्देशन में उतरे अरूप ने अच्छा काम किया है लेकिन बेहतर पटकथा की कमी साफ दिखती है। फिल्म का संगीत काफी शानदार है।
अनुपम खेर और शर्मिला टैगोर ने पटकथा की कमी को काफी हद तक पूरा करने की कोशिश की है। वही नरर्गिस के अभिनय को देखकर लगता है कि उन्हें एक्टिंग कोर्स में दाखिला लेने की जरूरत है। रजत कपूर और दिव्या दत्ता का अभिनय बेहतर रहा वही अविका गौर काफी प्यारी लगी है।
कुल मिलकार कहा जाए तो फिल्म को देखने के लिए सिनेमा हाल जाने की जरूरत नहीं है घर पर बैठकर टीवी पर देख सकते है।
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&13;कलाकार: अनुपम खेर, रजत कपूर, दिव्या दत्ता, अविका गौर, नरगिस, शर्मिला टैगोर&13;प्रोफेसर जोयमोहन (अनुपम खेर) कलकत्ता में रहतें है। वे दिल के मरीज है। एक बार उनके जन्मदिन पर उन्हें दिल का दौरा पड़ता है तो उस दिन उन्हें लगता है कि वह अपना बाकी की जिंदगी अपने परिवार के साथ मुम्बई में बिताएं।
वे अपने बेटे (रजत कपूर), बहू (दिव्या दत्ता) और पोती गार्गी (अविका गौर) के पास मुम्बई पहुंचते है। उनके आने से बेटा और पोती तो खुश होते है लेकिन बहू खुश नही होती है वह लगातार अपनी नाराजगी जाहिर करती रहती है।
जोयमोहन अपनी बोरियत दूर करने के लिए पास के पार्क में सुबह सैर के लिए जाने लगते है। एक सुबह उन्हें अपनी पुरानी छात्रा नीलिमा (शर्मिला टैगोर) और उसकी बेटी अंजली (नरगिस) मिलती है। अंजली अमरीका से डॉक्टरेट की उपाधि लेना चाहती है। जोयमोहन और नीलिमा जिंदगी की कुछ सच्चाईयां एक दूसरे से बांटते है जो दूसरे लोगो के लिए रहस्य है यही फिल्म की कहानी है।
मार्निंग वाक में कुछ नया नही है। निर्देशक ने एक साथ कई चीजों को परोसने की कोशिश की है। अनुपम खेर और अविका गौर के बीच तथा शर्मिला टैगोर के बीच दृश्य अच्छी तरह फिल्माए गए है। दिव्या दत्ता ने फिल्म बागबां में भी ऐसा ही रोल किया था।
&13;निर्देशक अरूप ने भावनात्मक दृश्यों में काफी मेहनत की है तकनीकी रूप से फिल्म काफी अच्छी बनी है। पहली बार निर्देशन में उतरे अरूप ने अच्छा काम किया है लेकिन बेहतर पटकथा की कमी साफ दिखती है। फिल्म का संगीत काफी शानदार है।
अनुपम खेर और शर्मिला टैगोर ने पटकथा की कमी को काफी हद तक पूरा करने की कोशिश की है। वही नरर्गिस के अभिनय को देखकर लगता है कि उन्हें एक्टिंग कोर्स में दाखिला लेने की जरूरत है। रजत कपूर और दिव्या दत्ता का अभिनय बेहतर रहा वही अविका गौर काफी प्यारी लगी है।
कुल मिलकार कहा जाए तो फिल्म को देखने के लिए सिनेमा हाल जाने की जरूरत नहीं है घर पर बैठकर टीवी पर देख सकते है।












