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35 साल बाद भी बरकरार 'शोले' का जादू

'शोले' के निर्माण के लिए कई हॉलीवुड फिल्मों से प्रेरणा ली गई थी लेकिन यह एक ऐसी सर्वोत्कृष्ट भारतीय फिल्म थी जिसमें नाटक और त्रासदी, रोमांस और हिंसा, हास्य और मार-धाड़ के बीच बेहतर संतुलन था।

इस साल 15 अगस्त को 'शोले' को प्रदर्शित हुए 35 साल हो जाएंगे। तीन दशक से भी लंबा समय बीत जाने के बाद 'शोले' के गब्बर, जय, वीरू और बसंती का जादू अब भी बरकरार है। 'शोले' आज भी भारतीय सिनेमा के लिए एक संदर्भ बिंदु है और इसे किसी एक विशेष शैली की फिल्म कहना मुश्किल है।

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यह जय और वीरू की कभी न खत्म होने वाली दोस्ती, एक युवा विधवा के खामोश प्यार, एक तांगे वाली और एक चोर के बीच रोमांस, एक आदर्शवादी पुलिस अधिकारी के त्रासद जीवन और आतंक की पहचान बने डाकू गब्बर सिंह की कहानी है। वर्ष 1975 में प्रदर्शित हुई इस फिल्म का निर्देशन रमेश सिप्पी ने किया था। फिल्म में संजीव कुमार, अमिताभ बच्चन, जया बच्चन, धर्मेद्र और हेमा मालिनी ने बेहतरीन अदाकारी की।

इस फिल्म से अमजद खान जैसे नए अभिनेता की एक खास पहचान बनी। वह हिंदी सिनेमा के सबसे प्रख्यात खलनायक बन गए। असरानी, जगदीप और यहां तक कि फिल्म में मुश्किल से एक संवाद बोलने वाले मैकमोहन भी लोगों की यादों में बस गए।

सलीम खान के साथ इस फिल्म की पटकथा लिख चुके जावेद अख्तर बताते हैं, "हमें जरा भी अनुमान नहीं था कि यह फिल्म इतनी सफल होगी। हमारे पास एक विचार था और जब हमने पटकथा लिखनी शुरू की तो हमें लगा कि इसमें दो से ज्यादा महत्वपूर्ण कलाकार हैं।"उन्होंने कहा कि 35 साल बाद भी इस फिल्म का छोटे से छोटा किरदार भी विज्ञापनों, प्रोमो, फिल्मों या हास्य धारावाहिकों में नजर आ जाता है।

फिल्म विश्लेषक तरन आदर्श कहते हैं, "कई कलाकारों वाली कोई भी फिल्म इतनी सफल नहीं हुई जितनी कि 'शोले' हुई थी। इसमें सब कुछ था। प्रदर्शन के बाद पहले दो सप्ताह में फिल्म ने कोई कमाल नहीं किया लेकिन तीसरे सप्ताह तक पहुंचकर इसने एक रात में सनसनी फैला दी।'

निर्माता जी.पी. सिप्पी ने उस समय तीन करोड़ के बजट में इस फिल्म का निर्माण किया। रमेश सिप्पी ने ढाई साल में इसे बनाया और 250 प्रिंट्स के साथ इसका प्रदर्शन हुआ।

 
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